चेतना ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-
नमस्ते। मेरा नाम चेतना हैं।मेरी शादी २२-२-२०१६ को हुई।शादी के दिन से
ही मुझे दहेज को लेकर सास,ननंद ताने मारने और मुझे परेशान करने लगे।मकान
बनाने के लिए 25,00,000 की मांग करने लगे,मायके से अपना हिस्सा लेने को
लेकर मारने पीटने लगे।मेरे बार बार मना करने पर, ननंद ने मुझे मार कर घर से
निकाल दिया,पति के गलत संबंध है दूसरी लड़की से, इसलिए पति भी अपने परिवार
का साथ देते हैं।मैं तीन महीने मायके में रही,पर मुझे कोई लेने नहीं
आया।फिर मेरे पिता जी मुझे ससुराल छोड़ गये,पर मुझे ससुराल वालों ने एक दिन
भी अच्छे नहीं रखा। मैंने 498,125 और घरेलू हिंसा आदि कोर्ट केस किया
है।पर मैं उनके साथ रहना चाहती हूं,और वो रखना नहीं चाहते।मेरा सवाल है
क्या अब कोर्ट मुझे उनके साथ रहने की अनुमति देगा? और अब मुझे क्या करना
चाहिए?
समाधान- आपने अपनी समस्या का जो जिक्र किया है उसमें आपने दो सवाल पूछे हैं-
पहले सवाल का उत्तर ये है कि आपने पहले ही घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कोर्ट में आवेदन कर रखा है और इस अधिनियम की धारा 17 में यह प्रावधान है कि वह आपको साझी गृहस्थी में निवास करने का अधिकार देती है अर्थात जहां आपसे विवाहित व्यक्ति निवास करता है वहां आपको भी निवास का अधिकार प्राप्त है और धारा 19 के अंतर्गत इसके लिए आवेदन करने पर न्यायालय आपके पति की गृहस्थी में आपके निवास करने का आदेश पारित कर सकता है। परंतु इस प्रकार के आदेश से आपको अपने पति के साथ निवास करने का अधिकार तो मिल सकता है पर आपकी स्थिति एक कब्जाधारी जैसी होगी जिसे भवन के किसी हिस्से में निवास का अधिकार है लेकिन आपके पति और ससुरालीजन आपसे किसी प्रकार की बातचीत या व्यवहार ना रखें तो इसके लिए उन्हें बाध्य नहीं किया जा सकता। जैसा कि आपने बताया है कि आप उनके साथ रहना चाहती हैं तो इसका अर्थ है कि आप उनके साथ एक परिवार के सदस्य की भांति रहना चाहेंगी ना कि किसी कमरे में अलग-थलग किसी बाहरी व्यक्ति के तौर पर जिसके पास कमरे का कब्जा तो हो पर भवन में निवासरत अन्य व्यक्तियों से उसका कोई संबंध ना हो।
दूसरा सवाल है कि आपको क्या करना चाहिए। अच्छी बात है कि आप साथ रहना चाहती हैं ये सब झेलने के बावजूद तो इसके लिए आपको सबसे पहले अपने पति से बात करनी चाहिए। यदि वे बात करने के लिए तैयार होते हैं और आपकी बात से सहमत होते हैं तो आगे का रास्ता खुल सकता है। आपका कहना है कि उनके किसी से संबंध हैं तो ये भी हो सकता है कि ये बात सुनी-सुनाई या निराधार भी हो सकती है और यदि आपको लगता है कि आपकी जानकारी पुख्ता है तो इसके बारे में भी पति से बात कर सकती हैं। सबसे बड़ी बात है कि यदि इस समस्या को आपको सुलझाना है तो आपको सीधे बात करनी होगी ना कि कोर्ट कचहरी के माध्यम से। हां यदि उसके बावजूद कोई हल ना निकले तब ऐसी स्थिति में कानूनी विकल्प का सहारा लेना ही मजबूरी बन जाता है और यदि किसी रिश्ते में इस तरह की परिस्थितियां निर्मित हो गई हैं कि अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है तो फिर आपको अपने भविष्य के बारे में सोचते हुए जल्दी ही निर्णय लेना चाहिए क्योंकि एक तरफ आप उनके साथ जाने को तैयार हैं और वे बिलकुल इसके लिए तैयार नहीं हों और लंबे समय तक कोई नतीजा ना निकले तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यदि आप अपने पति से संबंध विच्छेद करना चाहें तो आपके पास आधार भी हैं-क्रूरता एवं आपके अलावा किसी अन्य के साथ शारीरिक संबंध रखना। आप अभी युवा हैं और समय बहुत कीमती है जल्दी इस मामले में बात कर कोई स्टैंड आपको लेना चाहिए। कभी कभी एक रास्ता बंद हो जाने पर उस पर चलने का प्रयास आपको कहीं नहीं ले जाता आपको उसे छोड़ना ही पड़ता है।
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Wednesday, September 20, 2017
Wednesday, June 29, 2016
पति की फैमिली से कैसे करें एडजस्ट
How to adjust and stay positive in matrimonial home
हमारे भारतीय समाज में विवाह केवल पति-पत्नी के बीच का विषय नहीं है। इसमें दोनों के परिवार, रिश्तेदारऔर जान-पहचान वालों के बीच भी एक नये रिश्ते की शुरुआत होती है और विवाह-बंधन में बंधने के बाद जिम्मेदारियां केवल जीवनसाथी के प्रति ही नहीं होतीं इसमें वे सभी शामिल होते हैं जो किसी भी रूप से जीवनसाथी से जुड़े हैं खासकर परिवार के बुजुर्ग सदस्य। हमारा पारिवारिक ढांचा अभी भी बहुत हद तक पारंपरिक है संयुक्त परिवार परंपरा खत्म होते जाने के बावजूद अभी भी घर में नववधू से ये आशा की जाती है कि वह एक पारंपरिक बहू और आदर्श बहू की तरह परिवार में शामिल हो, जितना संभव हो घर के सदस्यों की देखभाल करे और जहां बहू कोई नौकरी या रोजगार नहीं कर रही है वहां उससे पारिवारिक जिम्मेदारियों का ज्यादा ख्याल रखने की अपेक्षा की जाती है जो कि स्वाभाविक भी है। शादी के बाद बदले हुए माहौल और परिवार के बड़ों के साथ सामंजस्य बिठाने में महिलाएं अक्सर असहज महसूस करती हैं खासतौर से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उन्मुक्तता के इस दौर में और जहां पर जरूरत है थोड़े से धैर्य के साथ तालमेल कायम करने की कोशिशों की वहां गलतफहमियां बढ़ती चली जाती हैं।
एक कहानी कुछ दिन पहले इसी विषय पर पढ़ने को मिली कि किस तरह के आचरण और नजरिये को साथ रखकर नये परिवार में रहने की शुरूआत की जानी चाहिए और यदि किसी कारण से कड़वाहट ने हमारे मन में जगह बना ली है तो उसे दूर करने की शुरूआत आज से ही कर देनी चाहिए --
एक लड़की की नयी-नयी शादी हुई और वो अपनी ससुराल में जाकर रहने लगी। ससुराल में केवल पति और उसकी बूढ़ी मां थे। शुरू-शुरू में तो बहू बनकर घर में आयी लड़की अपनी सास के सभी आदेशों का पालन करती पर कुछ महीने बीत जाने के बाद उसे सास की टोका-टाकी बुरी लगने लगी और दोनों में खटपट शुरू हो गई।
वह अपने पति से रोज शिकायतें करती और उधर सास उसके बुरे व्यवहार का ताना देती। जैसा कि अक्सर होता है पति की समझ में नहीं आता था कि वो किसका पक्ष ले और किसे समझााये।
एक बार बहू गुस्से में अपने मायके आ गई और अपने पिता से बोली कि मैं अपनी सास को जिंदा नहीं देख सकती। उसके पिताजी वैद्य थे, उसने कहा किआप मुझे सास के भोजन में मिलाने को जहर दे दीजिए।
उसके पिताजी ने उसे कुछ पुडि़या बनाकर दीें और कहा कि इनमें से एक को रोज खाने में डालकर अपनी सास को दे देना। ये धीमा जहर है कुछ महीनों बाद इस जहर के असर से उसकी मौत हो जाएगी पर तुम्हें एक काम करना होगा जब भी सास तुमसे कुछ कहे तो तुम्हें चुप रहना होगा और उससे अच्छा व्यवहार करना होगा जब तक उसकी मृत्ुयु ना हो जाए जिससे किसी को तुम पर शक ना हो।
बहू खुशी-खुशी होकर अपने ससुराल लौटी और उसने उसी दिन से उस जहर को सास को खाने के साथ देना शुरू कर दिया। अब वो सास के मनपसंद व्यंजन बनाती और उसमें जहर मिलाकर उसे खिलाती, उसकी सेवा करती और उसके साथ अच्छे से पेश आती साथ ही साथ मन ही मन इस बात को लेकर खुश रहती कि कुछ ही दिनों में इस सासू मां से छुटकारा मिलने वाला है।
कुछ ही महीनों में उसकी सास के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया। वो ना तो अपनी बहू से कुछ कहती ना किसी से उसकी शिकायत करती। उल्टा जो मिलता उससे बहू के व्यवहार की तारीफ करती । घर का माहौल भी पहले से बहुत सकारात्मक हो गया। उसकी अपनी सास के प्रति कड़वाहट खतम हो गई और उसे लगने लगा कि उसके कामों की तारीफ करने वाला भी कोई घर में है।
तब एक दिन उसे बहुत चिंता हुई और वो अपने पिता के पास जाकर बोली कि मैं अपनी सास को नहीं मारना चाहती। आप तो वैद्य हैं आपने जो जहर मुझे दिया उसके असर को खत्म करने और सास की जान बचाने को कोई औषधि दीजिए।
तब उसके पिताजी ने कहा कि तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, मैंने तुम्हें कोई जहर दिया ही नहीं था। मैंने तो बस हाजमा ठीक रखने की दवा दी थी। जहर तुम्हारे नजरिये में भरा था जो तुम अपनी सास को मारने चली थीं। उसे बदलने की जरूरत थी और आज उसका परिणाम तुम देख रही हो। अब जाओ और खुशी-खुशी अपना जीवन बिताओ।
image credit : theknot.com
हमारे भारतीय समाज में विवाह केवल पति-पत्नी के बीच का विषय नहीं है। इसमें दोनों के परिवार, रिश्तेदारऔर जान-पहचान वालों के बीच भी एक नये रिश्ते की शुरुआत होती है और विवाह-बंधन में बंधने के बाद जिम्मेदारियां केवल जीवनसाथी के प्रति ही नहीं होतीं इसमें वे सभी शामिल होते हैं जो किसी भी रूप से जीवनसाथी से जुड़े हैं खासकर परिवार के बुजुर्ग सदस्य। हमारा पारिवारिक ढांचा अभी भी बहुत हद तक पारंपरिक है संयुक्त परिवार परंपरा खत्म होते जाने के बावजूद अभी भी घर में नववधू से ये आशा की जाती है कि वह एक पारंपरिक बहू और आदर्श बहू की तरह परिवार में शामिल हो, जितना संभव हो घर के सदस्यों की देखभाल करे और जहां बहू कोई नौकरी या रोजगार नहीं कर रही है वहां उससे पारिवारिक जिम्मेदारियों का ज्यादा ख्याल रखने की अपेक्षा की जाती है जो कि स्वाभाविक भी है। शादी के बाद बदले हुए माहौल और परिवार के बड़ों के साथ सामंजस्य बिठाने में महिलाएं अक्सर असहज महसूस करती हैं खासतौर से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उन्मुक्तता के इस दौर में और जहां पर जरूरत है थोड़े से धैर्य के साथ तालमेल कायम करने की कोशिशों की वहां गलतफहमियां बढ़ती चली जाती हैं।
एक कहानी कुछ दिन पहले इसी विषय पर पढ़ने को मिली कि किस तरह के आचरण और नजरिये को साथ रखकर नये परिवार में रहने की शुरूआत की जानी चाहिए और यदि किसी कारण से कड़वाहट ने हमारे मन में जगह बना ली है तो उसे दूर करने की शुरूआत आज से ही कर देनी चाहिए --
एक लड़की की नयी-नयी शादी हुई और वो अपनी ससुराल में जाकर रहने लगी। ससुराल में केवल पति और उसकी बूढ़ी मां थे। शुरू-शुरू में तो बहू बनकर घर में आयी लड़की अपनी सास के सभी आदेशों का पालन करती पर कुछ महीने बीत जाने के बाद उसे सास की टोका-टाकी बुरी लगने लगी और दोनों में खटपट शुरू हो गई।
वह अपने पति से रोज शिकायतें करती और उधर सास उसके बुरे व्यवहार का ताना देती। जैसा कि अक्सर होता है पति की समझ में नहीं आता था कि वो किसका पक्ष ले और किसे समझााये।
एक बार बहू गुस्से में अपने मायके आ गई और अपने पिता से बोली कि मैं अपनी सास को जिंदा नहीं देख सकती। उसके पिताजी वैद्य थे, उसने कहा किआप मुझे सास के भोजन में मिलाने को जहर दे दीजिए।
उसके पिताजी ने उसे कुछ पुडि़या बनाकर दीें और कहा कि इनमें से एक को रोज खाने में डालकर अपनी सास को दे देना। ये धीमा जहर है कुछ महीनों बाद इस जहर के असर से उसकी मौत हो जाएगी पर तुम्हें एक काम करना होगा जब भी सास तुमसे कुछ कहे तो तुम्हें चुप रहना होगा और उससे अच्छा व्यवहार करना होगा जब तक उसकी मृत्ुयु ना हो जाए जिससे किसी को तुम पर शक ना हो।
बहू खुशी-खुशी होकर अपने ससुराल लौटी और उसने उसी दिन से उस जहर को सास को खाने के साथ देना शुरू कर दिया। अब वो सास के मनपसंद व्यंजन बनाती और उसमें जहर मिलाकर उसे खिलाती, उसकी सेवा करती और उसके साथ अच्छे से पेश आती साथ ही साथ मन ही मन इस बात को लेकर खुश रहती कि कुछ ही दिनों में इस सासू मां से छुटकारा मिलने वाला है।
कुछ ही महीनों में उसकी सास के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया। वो ना तो अपनी बहू से कुछ कहती ना किसी से उसकी शिकायत करती। उल्टा जो मिलता उससे बहू के व्यवहार की तारीफ करती । घर का माहौल भी पहले से बहुत सकारात्मक हो गया। उसकी अपनी सास के प्रति कड़वाहट खतम हो गई और उसे लगने लगा कि उसके कामों की तारीफ करने वाला भी कोई घर में है।
तब एक दिन उसे बहुत चिंता हुई और वो अपने पिता के पास जाकर बोली कि मैं अपनी सास को नहीं मारना चाहती। आप तो वैद्य हैं आपने जो जहर मुझे दिया उसके असर को खत्म करने और सास की जान बचाने को कोई औषधि दीजिए।
तब उसके पिताजी ने कहा कि तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, मैंने तुम्हें कोई जहर दिया ही नहीं था। मैंने तो बस हाजमा ठीक रखने की दवा दी थी। जहर तुम्हारे नजरिये में भरा था जो तुम अपनी सास को मारने चली थीं। उसे बदलने की जरूरत थी और आज उसका परिणाम तुम देख रही हो। अब जाओ और खुशी-खुशी अपना जीवन बिताओ।
image credit : theknot.com
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