ये तो हम सब ही कहीं ना कहीं महसूस कर रहे हैं कि विवाह नामक संस्था हमारे यहां एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और पति—पत्नी के रिश्ते कभी कभी इतनी नाजुक स्थिति में पहुंच जाते हैं जहां से उनको वापस पटरी पर लाना मुश्किल जान पड़ता है । हालांकि विवाद की जड़ में जाया जाए तो सभी नहीं पर अधिकांश मामलों में ये वजहें बहुत ही छोटी होती हैं और जैसे किसी छोटी बीमारी की स्थिति में उसके प्रति लापरवाही बरतने से वो लंबे समय में बड़ी बन जाती है और उसका इलाज भी मुश्किल हो जाता है वैसा ही हाल इन मामलों में पाया जाता है।
वकालत के पेशे में होने के कारण मेरा दिन—प्रतिदिन का अनुभव है कि बदलते सामाजिक—आर्थिक माहौल, एकल परिवार, अत्यधिक व्यस्तता और समय की कमी एवं बहुत सी छोटी छोटी बातें पति पत्नी के संबंधों को बेवजह अदालत के दरवाजे पर ला खड़ा कर देती हैं। अधिकांश मामलों में ऐसे विवादों की दिशा इस बात पर भी निर्भर करती है कि आसपास के लोग मामले में किस प्रकार से दखल दे रहे हैं अर्थात मामले के प्रति उनका सकारात्मक या नकारात्मक रुख मामले की दिशा तय करता है।
आजकल ये भी बहस का विषय है कि विवाह और दहेज कानून इस प्रकार के हैं कि उनका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी हो रहा है इसका दूसरा पक्ष यह भी है वास्तविक पीड़ितों की संख्या भी अच्छी खासी है। ऐसे में कानून से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी भी बढ जाती है चाहे वह पुलिस हो या वकील अथवा न्यायाधीश। हमारा फैमिली कोर्ट एक्ट भी कहता है कि परिवार न्यायालय का यह कर्तव्य है कि यदि मामले की परिस्थितियों में ऐसा संभव है तो वह सबसे पहले पक्षकारों में समझौता कराने का प्रयास करे।
ऐसी परिस्थितियों में आवश्यकता है इस बात की कि पति अथवा पत्नी या दोनों ही एक साथ जिस व्यक्ति या फोरम के समक्ष अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं वह चाहे कोई करीबी व्यक्ति हो अथवा कोई सामाजिक कार्यकर्ता हो, वकील हो या पुलिस अधिकारी और न्यायाधीश, उनको बहुत समझदारी से देखना होगा कि पीड़ित के हित को देखते हुए उसके वैवाहिक जीवन को बचाये रखने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए साथ ही यदि कोई कानूनी कदम उठाया जाना जरूरी हो गया है तो वह क्या हो? क्योंकि अक्सर जल्दबाजी में या किसी की सलाह पर उठाये गये कानूनी कदमों के परिणाम बाद में भयानक होते हैं। इसलिए दोनों ही स्थितियों में चाहे मामला आपसी सुलह से निपट सकता हो अथवा कानूनी कदम उठाना जरूरी लग रहा हो, कदम उठाने से पहले इस क्षेत्र से संबंधित किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह को जरूर अमल में लायें ताकि अनजाने में हुई गलतियों को बेवजह ना भुगतना पड़े।
हमारे देश में अभी इस विषय से संबंधित विशेषज्ञों की बेहद कमी है और प्रत्येक मामले में केवल कानून ही स्थायी समाधान प्रदान नहीं कर सकता है। इसलिए विशेषज्ञ के लिए आवश्यक है कि वह इस समस्या के केवल कानूनी पहलू को ही ना समझे बल्कि उसे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी समझे और उसके अनुरूप लोगों की मदद करे।
इस ब्लॉग का उददेश्य है कि इस प्रकार की समस्याओं पर जानकारी प्रदान करने और उसके कानूनी पहलुओं से लोगों को अवगत कराने और यदि आवश्यक हो तो उनकी काउंसलिंग करने के लिए एक आॅनलाइन मंच उपलब्ध कराना। साथ ही विवाह पूर्व काउंसलिंग या प्री मैरिटल काउंसिलिंग भी एक ऐसा विषय है जिसके बारे में हमारे समाज में जागरूकता की जरूरत है। विवाह से पहले मनोवैज्ञानिक रूप से इसके लिए खुद को तैयार करने और मैरिज लाइफ को खुशहाल और आनंदपूर्वक जीने के लिए आवश्यक रवैये को अपनाने के लिये यह महत्वपूर्ण है। यह ब्लॉग प्रयास है इन विषयों पर हिन्दी में अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध कराना और लोगों की निजी शादीशुदा जिंदगी की समस्याओं का समाधान करने में मार्गदर्शन करना।
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