Thursday, June 23, 2016

कोर्ट के हस्‍तक्षेप से एक पारिवारिक विवाद का सुखद अंत

वैवाहिक कानूनों से संबंधित कम ही मामले होते हैं जिनमें मुकदमेबाजी के बावजूद उनका अंत सुखद रुप में होता है। झारखण्‍ड में एक ऐसा वाकया हुआ जिससे बहुत सारे लोगों को सीख मिल सकती है कि कैसे छोटी छोटी बातों से पैदा होने वाले झगड़ों को मध्‍यस्‍थता से शांतिपूर्वक निपटाया जा सकता है और समाज में उठने वाले ऐसे ही वाकयों से निपटने में एक स्‍वयंसेवी के तौर पर किस प्रकार मदद की जा सकती है।



बबन ने अपनी पत्‍नी प्रियंका के विरूद्ध दांपत्‍य अधिकारों की पुनर्स्‍थापना (Restitution of Conjugal Rights under section 9 HMA) के लिए कोर्ट में एक याचिका दायर कर रखी थी जिसमे उसका कहना था कि उसकी पत्‍नी बिना किसी कारण से सन 2010 से उससे अलग रह रही है। प्रियंका ने अपने अलग रहने का कारण भी न्‍यायालय को बताया कि उसके पति और उसके ससुराल के लोग उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने की अनुमति नहीं दे रहे। जबकि विवाह के वक्‍त वे पढ़ाई के लिए सहमत थे। परिवार न्‍यायालय ने याचिका स्‍वीकार करके उसे पति के साथ रहने का आ‍देश पारित कर दिया जिसके खिलाफ प्रियंका ने झारखंड हाईकोर्ट में  अपील पेश की। चीफ जस्‍टिस वीरेंदर सिंह और जस्टिस चंद्रशेखर ने इस कपल को कोर्ट में उपस्थित रहने का आदेश दिया और उन्‍हें साथ रहने के लिए समझाया और छह हफ्ते बाद अगली सुनवाई के लिए मामला नियत किया। 

छह हफ्ते बाद जब दोनों कोर्ट के सामने उपस्थित हुए तो उन्‍होंने बताया कि वे खुशी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं और जो भी गलतफहमियां उनके बीच थीं, उनको भी दूर कर लिया है। साथ ही उन्‍होंने न्‍यायालय से निवेदन किया कि वे झारखंड राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण के तहत पैरा लीगल वॉलंटियर्स/मध्‍यस्‍थ/सुलहकर्ता के रूप में काम करना चाहते हैं। उनके निवेदन पर न्‍यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ( District Legal Services Authority DLSA ) धनबाद को निर्देश दिया कि दोनों को प्राधिकरण के पैनल में Para Legal Volunteers के तौर पर काम करने के लिए शामिल किया जाए। न्‍यायपीठ ने अपने फैसले में कहा कि Matrimonial Disputes के  मामलों में ये पति-पत्‍नी काउंसलर की भूमिका ज्‍यादा प्रभावी तरीके से निभा सकते हैं जाे कि व्‍यापक रूप से समाज के हित में होगा एवं हमारा यह भी मत है कि Jharkhand State Legal Service Authority को इन दोनों को इस सेवा को देने का अनुरोध करने के लिए सम्‍मानित भी करना चाहिए। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि राज्‍य प्राधिकरण द्वारा इस जोड़े को एक स्‍मृतिचिन्‍ह और साथ ही घरेलू उपयोग की किसी वस्‍तु को गिफ्ट के रूप में दिया जाए। 

इस मामले में माननीय उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायमूर्तिगण की भूमिका बहुत ही सराहनीय है जिन्‍होंने ना केवल इन पति-पत्‍नी को इस प्रकार की समझाइश दी कि एक छोटी सी बात से पैदा हुई मुकदमेबाजी खत्‍म हुई और दोनों ने ना केवल अपने स्‍वयं के रिश्‍ते में आई कड़वाहट को दूर किया बल्कि समाज में औरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करने को अपनी सेवाएं देने का आग्रह न्‍यायालय से किया। न्‍यायाधीशगण ने इन दोनों को इस जिम्‍मेदारी के काबिल मानकर ना केवल उनका आग्रह स्‍वीकार किया बल्कि उन्‍हें सम्‍मानित करने का भी आदेश दिया। इस तरह से मामले का सकारात्‍मक रूप से पटाक्षेप होना एक उदाहरण है ना केवल विवाद में फंसे पक्षकारों के लिए बल्कि निचली अदालतों के जज और एडवोकेट्स के लिए भी कि किस तरह से उन्‍हें ऐसे मामलों में एक प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए। 

image source : jhr.nic.in

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